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श्री गायत्री माता की आरती

  • Writer: mohit goswami
    mohit goswami
  • Jan 5
  • 2 min read

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता।


आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जग पालन कर्त्री।


दुःख शोक भय क्लेश कलह दारिद्र्य दैन्य हर्त्री॥१॥


ब्रह्मरूपिणी, प्रणत पालिनी, जगत धातृ अम्बे।


भव-भय हारी, जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥२॥


भयहारिणि, भवतारिणि, अनघे अज आनन्द राशी।


अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी॥३॥


कामधेनु सत-चित-आनन्दा जय गंगा गीता।


सविता की शाश्वती, शक्ति तुम सावित्री सीता॥४॥


ऋग्, यजु, साम, अथर्व, प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे।


कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्रा शोभा गुण गरिमे॥५॥


स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी।


जय सतरूपा वाणी, विद्या, कमला, कल्याणी॥६॥


जननी हम हैं दीन, हीन, दुःख दारिद के घेरे।


यदपि कुटिल, कपटी कपूत तऊ बालक हैं तेरे॥७॥


स्नेह सनी करुणामयि माता चरण शरण दीजै।


बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे दया दृष्टि कीजै॥८॥


काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये।


शुद्ध, बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥९॥


तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि, पुष्टि त्राता।


सत मारग पर हमें चलाओ जो है सुखदाता॥१०॥


जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता॥



– चेतना, प्रकाश और सद्बुद्धि का जागरण

जब मन को दिशा चाहिए और बुद्धि को शुद्धता की तलाश होती है, तब श्री गायत्री माता की आरती अंतर्मन में दिव्य प्रकाश जगा देती है। माता गायत्री को वेदों की जननी कहा गया है — वे ज्ञान, प्रज्ञा और आत्मबोध की प्रतीक हैं।

आरती के समय जलता हुआ दीप उस तेजस्वी ऊर्जा का स्मरण कराता है, जो अज्ञान, भ्रम और नकारात्मकता को दूर कर देती है। गायत्री माता का स्मरण केवल पूजा नहीं, बल्कि विचारों को पवित्र करने की साधना है।

श्री गायत्री माता की आरती हमें सिखाती है कि सच्चा बल शरीर में नहीं, बल्कि शुद्ध बुद्धि और सत्कर्म में होता है। उनका आशीर्वाद जीवन को अनुशासित, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण बनाता है।

जो श्रद्धा और एकाग्रता से श्री गायत्री माता की आरती करता है, उसके जीवन में विवेक, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है।जहाँ गायत्री का प्रकाश होता है,वहाँ अंधकार टिक नहीं पाता।यही श्री गायत्री माता की आरती की दिव्य महिमा है।

 
 
 

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