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श्री चित्रगुप्त जी की आरती

  • Writer: mohit goswami
    mohit goswami
  • Jan 4
  • 2 min read

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे।भक्त जनों के इच्छित, फल को पूर्ण करे॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

विघ्न विनाशक मंगलकर्ता, सन्तन सुखदायी।भक्तन के प्रतिपालक, त्रिभुवन यश छायी॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

रूप चतुर्भुज, श्यामल मूरति, पीताम्बर राजै।मातु इरावती, दक्षिणा, वाम अङ्ग साजै॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

कष्ट निवारण, दुष्ट संहारण, प्रभु अन्तर्यामी।सृष्टि संहारण, जन दु:ख हारण, प्रकट हुये स्वामी॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

कलम, दवात, शङ्ख, पत्रिका, कर में अति सोहै।वैजयन्ती वनमाला, त्रिभुवन मन मोहै॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

सिंहासन का कार्य सम्भाला, ब्रह्मा हर्षाये।तैंतीस कोटि देवता, चरणन में धाये॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

नृपति सौदास, भीष्म पितामह, याद तुम्हें कीन्हा।वेगि विलम्ब न लायो, इच्छित फल दीन्हा॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

दारा, सुत, भगिनी, सब अपने स्वास्थ के कर्ता।जाऊँ कहाँ शरण में किसकी, तुम तज मैं भर्ता॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

बन्धु, पिता तुम स्वामी, शरण गहूँ किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

जो जन चित्रगुप्त जी की आरती, प्रेम सहित गावैं।चौरासी से निश्चित छूटैं, इच्छित फल पावैं॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥

न्यायाधीश बैकुण्ठ निवासी, पाप पुण्य लिखते।हम हैं शरण तिहारी, आस न दूजी करते॥ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥



श्री चित्रगुप्त जी की आरती – कर्म, न्याय और सत्य का स्मरण

जब जीवन में अपने कर्मों और उनके परिणामों का बोध होता है, तब श्री चित्रगुप्त जी की आरती आत्मा को भीतर से जागृत करती है। भगवान चित्रगुप्त को यमराज का लेखक कहा गया है, जो प्रत्येक प्राणी के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा रखते हैं। उनकी आरती हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि सही मार्ग दिखाने के लिए है।

आरती के समय जलता हुआ दीप मानो यह याद दिलाता है कि संसार में कोई भी कर्म छुपा नहीं रहता। शब्दों, विचारों और कार्यों — सबका लेखा होता है। श्री चित्रगुप्त जी का स्मरण हमें सत्य, ईमानदारी और न्याय के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

यह आरती हमें आत्ममंथन सिखाती है — कि हम दूसरों के साथ ही नहीं, स्वयं के साथ भी न्याय करें। जब मन निर्मल होता है और कर्म शुद्ध होते हैं, तभी सच्ची शांति मिलती है।

जो श्रद्धा और विश्वास से श्री चित्रगुप्त जी की आरती करता है, उसके जीवन में विवेक, संतुलन और सद्बुद्धि का विकास होता है।क्योंकि जहाँ कर्म सही होते हैं,वहीं ईश्वर का भय नहीं —केवल संतोष और सत्य का प्रकाश होता है।

 
 
 

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