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श्री संतोषी माता आरती

  • Writer: mohit goswami
    mohit goswami
  • Jan 5
  • 2 min read

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता ।


अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता ॥


जय सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो ।


हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो ॥


जय गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे ।


मंद हँसत करूणामयी, त्रिभुवन जन मोहे ॥


जय स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे ।


धूप, दीप, मधुमेवा, भोग धरें न्यारे ॥


जय गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामे संतोष कियो।


संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो ॥


जय शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही ।


भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही ॥


जय मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई ।


विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई ॥


जय भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै ।


जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै ॥


जय दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए ।


बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए ॥


जय ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो ।


पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो ॥


जय शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे ।


संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे ॥


जय संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे ।


ॠद्धिसिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे ॥



– संतोष, श्रद्धा और विश्वास का मार्ग

जब जीवन में अधैर्य, कमी और असंतोष मन को घेरने लगता है, तब श्री संतोषी माता की आरती भीतर शांति और संतुलन का दीप जला देती है। माता संतोषी केवल एक देवी नहीं, बल्कि संतोष और धैर्य से भरे जीवन का संदेश हैं।

आरती के समय प्रज्वलित दीप यह सिखाता है कि इच्छाओं की आग से नहीं, बल्कि संतोष की भावना से जीवन उज्ज्वल बनता है। माता का स्मरण हमें यह समझाता है कि जो है, उसी में खुश रहना ही सबसे बड़ा वरदान है।

श्री संतोषी माता की आरती हमें विश्वास दिलाती है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि नियम, संयम और आस्था में होती है। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता की आराधना करता है, उसके जीवन में धीरे-धीरे हर समस्या का समाधान स्वयं होने लगता है।

जो श्रद्धा और धैर्य से श्री संतोषी माता की आरती करता है, उसके मन में शांति, घर में सुख और जीवन में संतुलन बना रहता है।जहाँ संतोष है,वहीं सच्चा सुख है।यही श्री संतोषी माता की आरती की सच्ची महिमा है।

 
 
 

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