श्री सरस्वती जी की आरती
- mohit goswami
- Jan 5
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श्लोक-या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभि र्देवैः सदा वन्दिता,सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्,वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥2॥
जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता ।दगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय सरस्वती माताचंद्रवदनि पदमासिनी, घुति मंगलकारी ।सोहें शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी ॥ जय सरस्वती माताबायेँ कर में वीणा, दायें कर में माला ।शीश मुकुट मणी सोहें, गल मोतियन माला ॥ जय सरस्वती मातादेवी शरण जो आयें, उनका उद्धार किया ।पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया ॥ जय सरस्वती माताविद्या ज्ञान प्रदायिनी, ज्ञान प्रकाश भरो ।मोह और अज्ञान तिमिर का जग से नाश करो ॥ जय सरस्वती माताधुप, दिप फल मेवा माँ स्वीकार करो ।ज्ञानचक्षु दे माता, भव से उद्धार करो ॥ जय सरस्वती मातामाँ सरस्वती जी की आरती जो कोई नर गावें ।हितकारी, सुखकारी ग्यान भक्ती पावें ॥ जय सरस्वती मातासरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता ।सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय सरस्वती माता

ज्ञान, वाणी और विवेक का प्रकाश
जब मन सीखने की इच्छा से भर जाता है और बुद्धि को सही दिशा की तलाश होती है, तब श्री सरस्वती जी की आरती आत्मा में ज्ञान का दीप जला देती है। माँ सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि शुद्ध विचार, मधुर वाणी और रचनात्मक चेतना का स्वरूप हैं।
आरती के समय जलता हुआ दीप अज्ञान के अंधकार को मिटाने का प्रतीक बन जाता है। वीणा की मधुर कल्पना के साथ ऐसा लगता है मानो मन की उलझनें शांत हो रही हों और विचार स्पष्ट होने लगते हों।
श्री सरस्वती जी की आरती हमें सिखाती है कि सच्चा ज्ञान अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता और विवेक लाता है। उनका श्वेत स्वरूप यह संदेश देता है कि मन और कर्म जितने निर्मल होंगे, बुद्धि उतनी ही उज्ज्वल होगी।
जो श्रद्धा और एकाग्रता से श्री सरस्वती जी की आरती करता है, उसके जीवन में सीखने की क्षमता, रचनात्मकता और आत्मविश्वास का विकास होता है।जहाँ सरस्वती का वास होता है,वहाँ अज्ञान नहीं टिकता।यही श्री सरस्वती जी की आरती की सच्ची महिमा है।



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